ट्रंप के झटके के बावजूद शेयर बाजार में तेजी, IT स्टॉक्स ने पकड़ी रफ्तार

मुंबई   
   अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा TCS, इंफोसिस, विप्रो और HCLTech समेत आठ बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़े PERM प्रोग्राम से सस्पेंड किए जाने के बावजूद शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में आईटी शेयरों में तेजी देखने को मिली. 9 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत तेजी के साथ हुई. मार्केट खुलते ही सेंसेक्स 700 अंकों से ज्यादा चढ़ गया, जबकि निफ्टी में 200 से अधिक अंकों की बढ़त दर्ज की गई. वहीं, रुपये में भी डॉलर के मुकाबले मजबूती देखने को मिली. रुपया 4 पैसे मजबूत होकर 96.74 प्रति डॉलर पर खुला. गुरुवार को कारोबार बंद होने के समय यह 96.78 प्रति डॉलर पर था। 

शुरुआती कारोबार में TCS, इंफोसिस, HCLTech समेत प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयर ग्रीन जोन में कारोबार करते नजर आए. शुरुआती कारोबार में इंफोसिस के शेयरों में 2.62%, टीसीएस के शेयरों में 3.39%, एचसीएल के शेयरों में 2.53% और विप्रो के शेयरों में 2.47% की तेजी देखने को मिली. अमेरिकी कार्रवाई के बीच विदेशी बाजारों में भी आईटी कंपनियों के शेयरों में मिलाजुला रुख देखने को मिला. नैस्डैक (Nasdaq) पर माइक्रोसॉफ्ट के शेयर 1.35% तक लुढ़क गए, जबकि कॉग्निजेंट के शेयरों में 5.15% की तेजी दर्ज की गई. वहीं, पेरिस स्टॉक एक्सचेंज में कैपजेमिनी के शेयर 0.045% की मामूली बढ़त के साथ कारोबार करते दिखे. नैस्डैक पर एडोबी के शेयरों में भी 3.56% का उछाल दर्ज किया गया। 

8 IT कंपनियों पर अमेरिकी एक्शन

अमेरिकी सरकार की ओर से TCS, इंफोसिस, विप्रो, HCLTech समेत आठ बड़ी आईटी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम से सस्पेंड किए जाने के बाद माना जा रहा था कि इन कंपनियों के शेयरों पर दबाव देखने को मिल सकता है. वजह यह है कि प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट (PERM) अमेरिका में रोजगार के आधार पर विदेशी कर्मचारियों के ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. इस पर रोक से प्रभावित कंपनियों के जरिए स्थायी निवास पाने की तैयारी कर रहे विदेशी कर्मचारियों के मामले अटक सकते हैं. इससे कंपनियों की रिक्रूटमेंट स्ट्रैटेजी और कारोबार पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर भी सवाल उठ रहे थे। 

हालांकि, शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआती चाल इसके उलट रही. भारतीय शेयर बाजार बढ़त के साथ खुला और प्रमुख आईटी कंपनियों के शेयर हरे निशान में कारोबार करते दिखे. इससे संकेत मिला कि निवेशकों ने फिलहाल अमेरिकी फैसले को लेकर तत्काल बड़ी बिकवाली नहीं की. हालांकि, केवल शुरुआती तेजी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि इस कार्रवाई का कंपनियों के कारोबार या शेयरों पर आगे कोई असर नहीं पड़ेगा. आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर कंपनियों के बयानों, अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम और इस फैसले के वास्तविक कारोबारी असर पर रहेगी। 

इस पूरे मामले में एक अहम बात यह है कि PERM से सस्पेंशन और कंपनियों के रोजमर्रा के कारोबार पर असर, दोनों अलग-अलग पहलू हैं. PERM मुख्य रूप से रोजगार के आधार पर ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया से जुड़ा है. इस पर रोक लगने का मतलब यह नहीं है कि कंपनियां अमेरिका में कारोबार नहीं कर सकेंगी या वहां काम कर रहे सभी विदेशी कर्मचारियों के वीजा रद्द हो जाएंगे. यही वजह है कि इस फैसले का बाजार पर तत्काल असर नहीं दिखा. इसके साथ-साथ कंपनियों के कारोबार पर इसके वास्तविक प्रभाव को अगले कुछ कारोबारी सत्रों में देखना अहम रहेगा। 

एक्शन पर IT कंपनियों ने दी प्रतिक्रया
भारत में सॉफ्टवेयर और आईटी सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों के संगठन नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनीज (NASSCOM) ने कहा है कि अमेरिकी सरकार की ओर से आईटी कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित करने का फैसला ग्रीन कार्ड पाने के एक खास रास्ते को प्रभावित करता है, न कि H-1B वीजा कार्यक्रम को. संगठन ने यह भी कहा कि भारतीय आईटी कंपनियों ने H-1B वीजा पर अपनी निर्भरता कम की है और अमेरिका में स्थानीय स्तर पर भर्तियां बढ़ाई हैं. ये कंपनियां अमेरिकी कारोबारों को सहयोग देने के साथ वहां जॉब क्रिएशन में भी योगदान दे रही हैं। 

वहीं, TCS ने साफ किया है कि इस कार्रवाई से उसकी अमेरिकी भर्ती रणनीति पर खास असर पड़ने की आशंका नहीं है. कंपनी अगले पांच साल में अमेरिका में 15,000 लोगों को नौकरी देने की योजना पर कायम है. TCS के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में उसके PERM आवेदन एक अंक में रहे हैं और अमेरिका में उसकी भर्ती रणनीति स्थानीय प्रतिभाओं को रोजगार देने पर केंद्रित है. माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि पिछले वित्त वर्ष में उसने करीब 6,000 H-1B वीजा आवेदन किए थे। 

इनमें से 80 फीसदी आवेदन पहले से कंपनी में काम कर रहे कर्मचारियों के वीजा की अवधि बढ़ाने या उनकी वीजा स्थिति में बदलाव के लिए थे, न कि नए लोगों को नौकरी देने के लिए. माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक, नए कर्मचारियों के लिए किए गए बाकी आवेदन उन लोगों के थे, जो पहले से कानूनी रूप से अमेरिका में रह रहे थे और कंपनी में नौकरी करने का फैसला लिया था. कंपनी ने कहा कि ये आवेदन अमेरिका में उसके कुल कर्मचारियों की संख्या का महज एक फीसदी थे। 

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button